अब उनको हमारी हर एक बात बुरी लगती है
वो जज्बात जिसमे हम बह बर्बाद हो गए,
अब क्या कहे, उनको वह जज्बात बुरी लगती है,
दूरियां हमसे बनाकर इस कदर रहते हैं महफ़िल में
क्या करे शिकवा, क्या शिकायत करें ऐ दिल उनसे,
अब तो उनको हमारी आदाब भी बुरी लगती है.
उनको मिले रौशनी, हम दिए सा जल खाक हो गए,
हम खाक से उठ शाख जब अपनी बनाने लगे,
अब उनको हमारी गुस्ताख शाख बुरी लगती है.
वो पंख लगा शाहीन सा उड़ा करते हैं आसमान में
हमने ख्वाब भी जो देखा एक लम्बी उछाल का
अब उनको हमारी हर एक उछाल बुरी लगती है.