मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

काया

 कल रात के अँधेरे में
खादी की धोती में लिपटी,
एक जड़ा सी जर्जर काया
डंडे के सहारे चलते हुए
नवयुग के मेले में,
आधुनिकता की दुकान पर आयी.
और किसी अहिंसा नामक वस्तु की
वर्षों बाद माँग फरमाई.
मैं चौंक गया,
स्वयं को स्वयं से रोक ना पाया,
कुछ ही पलों में मैंने 
खुद को उस काया की छाया में पाया. 
मैंने पूछा...
" आप कौन हैं  ?
और यह विचित्र  सी वस्तु क्या है ?"
उसने मेरी और अचानक देखा 
थी ललाट पार चिंता की गहरी रेखा.
उसने बोला....
"इसी वस्तु से मैंने
तुम्हारी इस पावन भूमि को
अपने खून की सिंचाई से सींचा है,
और तुम्हारे इस मेले की दुकानों में
इसी वस्तु की नीव हैं "
इतना कहकर अपने पथ पार
हुई वह काया अग्रसर.
मैं उसकी बातें समझ नहीं पाया
जाते जाते उसने अपना नाम
कोई... गाँधी... बताया.

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

मेरी कौन सुनेगा

              कटोरा लिए  बैठा मैं सड़क किनारे, 
              जो आये  कुछ दे ना दे ताने जरूर मारे.
              कहते है भिखारी राष्ट्र पार दाग हैं,
              जितनी हाथ उतने डफली उतने राग हैं.


                    भीख ना मांगे तो क्या काम करें
                    क्या यहाँ बचा भी कोई काम है,
                    पढ़े लिखे तो बैठे बेकार हैं,
                    हम काले भैंस तो फिर भी लाचार  हैं.


              भूख सताए तो पानी पी लेते हैं,
             जीना तो दूर हम हर वक़्त मरते हैं.
              मौत भी आती नहीं हमको जल्दी,
              हम मर मर के जी लेते हैं.


                    जब खेलने पढने की उम्र थी,
                    होनी थी हाथों में खिलोने कलमे,
                    पाया मैंने एक टूटा कटोरा,
                    मैं नहीं पढ़ पाया, नहीं बढ़ पाया.

             इसमें मेरी गलती क्या थी...
             मेरे इस दर्द को कौन सहलाएगा,
             इन बहरों की बस्ती में
             मेरी कौन सुनेगा, मेरी कौन सुनेगा.......