मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

काया

 कल रात के अँधेरे में
खादी की धोती में लिपटी,
एक जड़ा सी जर्जर काया
डंडे के सहारे चलते हुए
नवयुग के मेले में,
आधुनिकता की दुकान पर आयी.
और किसी अहिंसा नामक वस्तु की
वर्षों बाद माँग फरमाई.
मैं चौंक गया,
स्वयं को स्वयं से रोक ना पाया,
कुछ ही पलों में मैंने 
खुद को उस काया की छाया में पाया. 
मैंने पूछा...
" आप कौन हैं  ?
और यह विचित्र  सी वस्तु क्या है ?"
उसने मेरी और अचानक देखा 
थी ललाट पार चिंता की गहरी रेखा.
उसने बोला....
"इसी वस्तु से मैंने
तुम्हारी इस पावन भूमि को
अपने खून की सिंचाई से सींचा है,
और तुम्हारे इस मेले की दुकानों में
इसी वस्तु की नीव हैं "
इतना कहकर अपने पथ पार
हुई वह काया अग्रसर.
मैं उसकी बातें समझ नहीं पाया
जाते जाते उसने अपना नाम
कोई... गाँधी... बताया.

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