मंगलवार, 21 सितंबर 2010

तुझको भी तो आती ही होगी

तुझको भी तो आती ही होगी

तुझको भी तो आती ही होगी
कभी कभी तो याद हमारी
मुझको तो बस याद है केवल
एक वही मुस्कान तुम्हारी

स्वर भुला, संगीत भुला
भुला सरगम, ताल, बांसुरी
मुझको तो  बस याद है केवल
पायल की झंकार तुम्हारी

सूने पथ पे कभी कभी तो
बिछती होगी पलक  तुम्हारी
असमानों से टकराकर नभ में
उलझी होगी नजर तुम्हारी

इतना तो बतला जाते
कब तक देखूं रह तुम्हारी
इन आँहों में छिपी हुई है
प्रीत हमारी और तुम्हारी

शहीद का बेटा

                       शहीद का बेटा

एक एक कर गुजर गए सारे ही त्यौहार  माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

बात बात में माँ तू आजकल जाने कहाँ खो जाती है
कहीं घुमने कहेने पे जाने क्यूँ रोने लग जाती है
कहाँ गयी मुस्कान तेरी कहाँ गया तेरा प्यार माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

क्यूँ तुने बिंदिया लगाना कुछ महीनो से छोड़ दिया
जिसमें था सिन्दूर माँग का उस डिबिया को तोड़ दिया
बिछिया, कंगन, पायल बिन तू लगती है बीमार माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

आंसू रोक नहीं पाई माँ, सुन तुतलाती बातों को
आ सीने से लग जा लाल, बोली फैलाकर बाँहों को
आँख पोंछ तब मुन्ना  बोला, होना ना लाचार माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

तुने तो कमजोर समझ कर, मुझसे सब छुपा लिया
कल विद्यालय में आचार्य जी ने सबकुछ  मुझे बता दिया
जान सच्चाई सारी मुझको गर्व हुआ आपार माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

तेरा दूध पिया है मैंने और आंचल में तेरे लेटा हूँ
बापू के सारे सपनों को कर  दूंगा साकार माँ
छुट्टी लेकर कब आयेंगे पापा अबकी बार माँ

रविवार, 19 सितंबर 2010

यहाँ को तो नहीं चले थे हम.

यहाँ को तो नहीं चले थे हम
जाने कब कहाँ भटक गए कदम
अंधियारी रातों में अनजानी राहों पे
कुछ डरे कुछ सहमे से हैं हम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम.............

 लगाया था फूल क्यूँ, काँटे फले चमन
नियति भी जाने क्यूँ हमीं पे ढाये  सीतम
चहकते मुखड़े थिरकते पाँव, खामोश से हैं
दीवारों के बंधन में बंधी खुशियाँ  और गम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम..............

न तुमने चाहा, न चाहे थे हम
फिर कहाँ टूटी ताल कहाँ खोया सरगम
कितना  सम्भालूँ खुद को अकेला मझधार में
अब आकर संभालो निकलने को है दम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम..............