मंगलवार, 21 सितंबर 2010

तुझको भी तो आती ही होगी

तुझको भी तो आती ही होगी

तुझको भी तो आती ही होगी
कभी कभी तो याद हमारी
मुझको तो बस याद है केवल
एक वही मुस्कान तुम्हारी

स्वर भुला, संगीत भुला
भुला सरगम, ताल, बांसुरी
मुझको तो  बस याद है केवल
पायल की झंकार तुम्हारी

सूने पथ पे कभी कभी तो
बिछती होगी पलक  तुम्हारी
असमानों से टकराकर नभ में
उलझी होगी नजर तुम्हारी

इतना तो बतला जाते
कब तक देखूं रह तुम्हारी
इन आँहों में छिपी हुई है
प्रीत हमारी और तुम्हारी

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  2. लेखन के मार्फ़त नव सृजन के लिये बढ़ाई और शुभकामनाएँ!
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    आलेख-"संगठित जनता की एकजुट ताकत
    के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी!"
    का अंश.........."या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें।"
    पूरा पढ़ने के लिए :-
    http://baasvoice.blogspot.com/2010/11/blog-post_29.html

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