शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

आज़ादी की तारीख


फिर आज़ादी की तारीख आयी है
सत्ता के गलियों में जश्न मनाये जायेंगे
कुछ पंछी लाये जायेंगे पिंजरों में
फिर खुले आमान में आज़ाद किये जायेंगे

आज़ादी के प्रतीक चिन्हों से
नारे बड़े बड़े लगाये जायेंगे
धूमिल धुँधली थकी आँखों को
 सुनहरे ख्वाब दिखाए जायेंगे

कुछ बातें होंगी, कुछ भूले याद लिए जायेंगे
कुछ तमगे बंटेंगे, कुछ घाव सहलाये जायेंगे
कुछ वादे होंगे रोटी के भूखो से
बेघरों के घर के आस दिलाये जायेंगे

वादे तो वादे है, सब भूल जायेंगे
फिर कल से सब जीवन संघर्ष में लग जायेंगे
विशिष्ठ आज़ादी विशिष्ठों को मुबारक
हम फिर कभी अपनी आज़ादी मनाएंगे

शनिवार, 2 अगस्त 2014

                                    मेरी बाँह पकड़ लो
   
                                     डर लगता है छूट न जाऊं
                                     मेरी  बाँह पकड़ लो..........

                   तुम हो मुझसे दूर साँझ से जितनी दूर सबेरा
                   ढूँढूं तुझको तिमिर में,  जैसे ढूँढे बिहग बसेरा

                                      मैं हारा, टूटा, निर्झर हूँ
                       अपने घट में भर लो, मेरी बाँह पकड़ लो...

                   सागर की लाहरों की कोलाहल में भटक गया हूँ
                   खोजूँ कैसे माया की मुरली में अटक गया हूँ

                                      छाया सा मैं साथ रहूँ
                      नग़ हूँ अपने में जड़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो..

                   कर्ण जर्जरित हूँ, टूटा हूँ, चन्दन का टूकड़ा हूँ
                   लपटों में थोडा झुलस गया हूँ लेकिन वही  मुखड़ा हूँ

                                     अब अपने लौ में समेट लो
                      अपनेपन में मढ़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो............

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे


रोज रोज न यूँ सता मुझको
मेरे दर्द का कोई तो हल कर दे
गुनाहे इश्क़ किया है मैंने
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

तू ही दर्द, तू ही दवा है
ये रोग भी मेरा लाजबाब बड़ा है
ऐ जान! जान हलक तक आ पहुँची है
अब तो इलाज़ का पहल कर दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

एक जंग छिड़ी है मेरे अंदर
घायल दिल अपना ही दुश्मन बना है
आकर करा दे सुलह मेरा, मेरे दिल से 
बहला दे मुझको, जरा बहाले अमन दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

लम्हा लम्हा हर रोज मरता हूँ मैं
तुझ संग एक पल में जीवन जीने को 
आँसू  गिरे हैं बहुत तेरे यादों में
इन आँसुओं का कोई मोल कर दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

एक अरसे से दिन बेजान पड़ा है
बनकर धड़कन इसमें जान भर दे 
बन जा मुमताज मेरे दिल की
दिल को मेरे ताजमहल कर दे 
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे 

गुरुवार, 10 जुलाई 2014


 आज बस इतना ही कहना है

हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको
आज बस इतना ही कहना है
दे दिल मेँ अपने आशियाँ छोटा सा
कहीँ और न अब मुझको रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....

अधूरा मैँ, जिँदगी, ख्वाब सब अधुरे
दो कदम चल सँग मेरे, कर दे पूरे
अपने रंग मेँ ही रंग दे मुझको
बेरंग और ना अब मुझको रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको...
आज बस इतना ही कहना है

सवाल बेहिसाब उलझे, नहीँ जबाब कोई
साथ साँसोँ का भी अब टूटने लगा है
सुलझा दे उलझन मेरी, कोई फैसला सुना दे
इस कशमकश मेँ अब और न रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....
आज बस इतना ही कहना है

तेरा हर झूठ, हर सच से सच्चा लगता है 
तुझसे मिला दर्द मलहम से अच्छा लगता है 
कैद करले मुझको अनपे जुल्फों के जाल में 
अब आजाद और न रहना है 
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....
आज बस इतना ही कहना है