मेरी बाँह पकड़ लो
डर लगता है छूट न जाऊं
मेरी बाँह पकड़ लो..........
तुम हो मुझसे दूर साँझ से जितनी दूर सबेरा
ढूँढूं तुझको तिमिर में, जैसे ढूँढे बिहग बसेरा
मैं हारा, टूटा, निर्झर हूँ
अपने घट में भर लो, मेरी बाँह पकड़ लो...
सागर की लाहरों की कोलाहल में भटक गया हूँ
खोजूँ कैसे माया की मुरली में अटक गया हूँ
छाया सा मैं साथ रहूँ
नग़ हूँ अपने में जड़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो..
कर्ण जर्जरित हूँ, टूटा हूँ, चन्दन का टूकड़ा हूँ
लपटों में थोडा झुलस गया हूँ लेकिन वही मुखड़ा हूँ
अब अपने लौ में समेट लो
अपनेपन में मढ़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो............
डर लगता है छूट न जाऊं
मेरी बाँह पकड़ लो..........
तुम हो मुझसे दूर साँझ से जितनी दूर सबेरा
ढूँढूं तुझको तिमिर में, जैसे ढूँढे बिहग बसेरा
मैं हारा, टूटा, निर्झर हूँ
अपने घट में भर लो, मेरी बाँह पकड़ लो...
सागर की लाहरों की कोलाहल में भटक गया हूँ
खोजूँ कैसे माया की मुरली में अटक गया हूँ
छाया सा मैं साथ रहूँ
नग़ हूँ अपने में जड़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो..
कर्ण जर्जरित हूँ, टूटा हूँ, चन्दन का टूकड़ा हूँ
लपटों में थोडा झुलस गया हूँ लेकिन वही मुखड़ा हूँ
अब अपने लौ में समेट लो
अपनेपन में मढ़ लो, मेरी बाँह पकड़ लो............
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