शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे


रोज रोज न यूँ सता मुझको
मेरे दर्द का कोई तो हल कर दे
गुनाहे इश्क़ किया है मैंने
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

तू ही दर्द, तू ही दवा है
ये रोग भी मेरा लाजबाब बड़ा है
ऐ जान! जान हलक तक आ पहुँची है
अब तो इलाज़ का पहल कर दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

एक जंग छिड़ी है मेरे अंदर
घायल दिल अपना ही दुश्मन बना है
आकर करा दे सुलह मेरा, मेरे दिल से 
बहला दे मुझको, जरा बहाले अमन दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

लम्हा लम्हा हर रोज मरता हूँ मैं
तुझ संग एक पल में जीवन जीने को 
आँसू  गिरे हैं बहुत तेरे यादों में
इन आँसुओं का कोई मोल कर दे
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे

एक अरसे से दिन बेजान पड़ा है
बनकर धड़कन इसमें जान भर दे 
बन जा मुमताज मेरे दिल की
दिल को मेरे ताजमहल कर दे 
कोई एक फैसला मुकम्मल कर दे 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें