गुरुवार, 10 जुलाई 2014


 आज बस इतना ही कहना है

हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको
आज बस इतना ही कहना है
दे दिल मेँ अपने आशियाँ छोटा सा
कहीँ और न अब मुझको रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....

अधूरा मैँ, जिँदगी, ख्वाब सब अधुरे
दो कदम चल सँग मेरे, कर दे पूरे
अपने रंग मेँ ही रंग दे मुझको
बेरंग और ना अब मुझको रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको...
आज बस इतना ही कहना है

सवाल बेहिसाब उलझे, नहीँ जबाब कोई
साथ साँसोँ का भी अब टूटने लगा है
सुलझा दे उलझन मेरी, कोई फैसला सुना दे
इस कशमकश मेँ अब और न रहना है
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....
आज बस इतना ही कहना है

तेरा हर झूठ, हर सच से सच्चा लगता है 
तुझसे मिला दर्द मलहम से अच्छा लगता है 
कैद करले मुझको अनपे जुल्फों के जाल में 
अब आजाद और न रहना है 
हाँ! मुहब्बत है तुमसे मुझको....
आज बस इतना ही कहना है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें