रविवार, 19 सितंबर 2010

यहाँ को तो नहीं चले थे हम.

यहाँ को तो नहीं चले थे हम
जाने कब कहाँ भटक गए कदम
अंधियारी रातों में अनजानी राहों पे
कुछ डरे कुछ सहमे से हैं हम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम.............

 लगाया था फूल क्यूँ, काँटे फले चमन
नियति भी जाने क्यूँ हमीं पे ढाये  सीतम
चहकते मुखड़े थिरकते पाँव, खामोश से हैं
दीवारों के बंधन में बंधी खुशियाँ  और गम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम..............

न तुमने चाहा, न चाहे थे हम
फिर कहाँ टूटी ताल कहाँ खोया सरगम
कितना  सम्भालूँ खुद को अकेला मझधार में
अब आकर संभालो निकलने को है दम
यहाँ को तो नहीं चले थे हम..............

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