आज फिर जल रहा है भारत
आज फिर जल रहा है भारत
खिडकियों से सब देख रहे नजारें
चीखती चित्कारती आग की लपटों में
झुलसी, बिलखती माँ पुकारे
बचाने को कौन कहे, उलटे सब घी फेंके
बचाने को कौन कहे, उलटे सब घी फेंके
और उफनते आग में अपनी अपनी रोटियां सेंके
हर जगह भय और आतंक का राज है
रक्षकों का भी आज बदला कुछ मिजाज है
धर्म, नीति सबकुछ बहा डाला नाली में
धर्म, नीति सबकुछ बहा डाला नाली में
दीपक रोली और पुष्प की जगह
कटे शीश हैं स्वागत थाली में
गौरव शीश हिमालय का आज झुका शर्म से नीचे है,
गौरव शीश हिमालय का आज झुका शर्म से नीचे है,
सहिष्णुता और मानवता को मानव छोड़ आया पीछे है,
कलम की जगह कड़ी फ़ौज लाठी, तलवारों और भालों की
खेतों में हरियाली की जगह,खड़ी फसल नरकंकालों की
लोकतंत्र के आंगन में आयी ये कैसी आंधी
लोकतंत्र के आंगन में आयी ये कैसी आंधी
घायल से हैं आंबेडकर और लड़खड़ाते गाँधी.
बजा दो भेरी रण का, वक़्त करता फरियाद है,
आजाद देश में जन्मे वीरों,तुम जन्म से ही आजाद हो.
कूद पड़ों रण में, अब और न ध्रितराष्ट्र से फ़रियाद करो.
हे आर्य धनंजय! माँ को अब आजाद करो
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