कटोरा लिए बैठा मैं सड़क किनारे,
जो आये कुछ दे ना दे ताने जरूर मारे.
कहते है भिखारी राष्ट्र पार दाग हैं,
जितनी हाथ उतने डफली उतने राग हैं.
भीख ना मांगे तो क्या काम करें
क्या यहाँ बचा भी कोई काम है,
पढ़े लिखे तो बैठे बेकार हैं,
हम काले भैंस तो फिर भी लाचार हैं.
भूख सताए तो पानी पी लेते हैं,
जीना तो दूर हम हर वक़्त मरते हैं.
मौत भी आती नहीं हमको जल्दी,
हम मर मर के जी लेते हैं.
जब खेलने पढने की उम्र थी,
होनी थी हाथों में खिलोने कलमे,
पाया मैंने एक टूटा कटोरा,
मैं नहीं पढ़ पाया, नहीं बढ़ पाया.
इसमें मेरी गलती क्या थी...
मेरे इस दर्द को कौन सहलाएगा,
इन बहरों की बस्ती में
मेरी कौन सुनेगा, मेरी कौन सुनेगा.......
बहुत खूब अभय भाई ,
जवाब देंहटाएंक्या खूब कहा कि मेरी कौन सुनेगा ? लिखते रहिए , शुभकामनाएं